वो चेहरा

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रंजीता नाथ घई सृजन 

गुम-सुम, गुम-सुम थी वो आँखें
थकी थकी सी सांसें उसकी 
घुटी–घुटी सी थी एक हंसी
डरा-डरा सा चेहरा था उसका
सहमा-सहमा रहता था वो|

बिखरी-बिखरी यादें उसकी
उजड़ा-उजड़ा बचपन जीता
मांग-मांग कर खता था वो
पाई-पाई न जोड़ पता था वो
पोथी-पोथी को तरसता था वो|

धुंदली-धुंदली आशा की एक किरण
दूर-दूर तक खोजता था वो
सिसकती-सिसकती तकदीर भी हारी
रोज-रोज़ की पीड़ा से वो
आहिस्ता-आहिस्ता मुक्ति पा गया वो|

मुंदी-मुंदी सी अब आँखें उसकी
अब शांत-शांत सा चेहरा था वो|

—–XxXxX—–

© All Rights Reserved.
©Ranjeeta Nath Ghai,  atrangizindagieksafar, 2016.

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